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मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय : उपन्यास सम्राट की प्रेरक जीवन यात्रा, प्रमुख रचनाएँ एवं साहित्यिक योगदान

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हिंदी और उर्दू साहित्य के आकाश में मुंशी प्रेमचंद एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी लेखनी ने भारतीय समाज के यथार्थ को सबसे प्रामाणिक और संवेदनशील रूप में प्रस्तुत किया। उन्हें आधुनिक हिंदी कहानी और उपन्यास का पितामह माना जाता है। प्रेमचंद जी ने उस दौर में साहित्य सृजन शुरू किया जब लेखन केवल राजा-रानियों, तिलिस्म और ऐयारी की काल्पनिक कहानियों तक सीमित था। उन्होंने साहित्य को महलों के विलास से बाहर निकालकर गांव की कच्ची पगडंडियों, किसानों के पसीने, मजदूरों की लाचारी और समाज के दबे-कुचले वर्ग की वास्तविक पीड़ा से जोड़ा।

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि से नवाजा था। प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन घोर आर्थिक अभावों, पारिवारिक संघर्षों और सामाजिक विसंगतियों से जूझते हुए बीता, लेकिन उन्होंने कभी अपनी कलम से समझौता नहीं किया। आइए, इस विस्तृत आलेख में जानते हैं मुंशी प्रेमचंद के जन्म, वास्तविक नाम, पारिवारिक संघर्ष, साहित्यिक यात्रा, प्रमुख कृतियों और उनके अमर विचारों के बारे में।

📌 मुंशी प्रेमचंद : एक नज़र में (Quick Facts Table)

विवरणमुख्य जानकारी
वास्तविक नामधनपत राय श्रीवास्तव
उर्दू में उपनामनवाब राय
प्रसिद्ध नाममुंशी प्रेमचंद
उपाधिउपन्यास सम्राट, कहानी सम्राट, कलम का सिपाही
जन्म तिथि31 जुलाई 1880
जन्म स्थानलमही गाँव, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
पिता का नाममुंशी अजायब लाल (डाकघर क्लर्क)
माता का नामआनंदी देवी
पत्नी का नामशिवरानी देवी (प्रसिद्ध लेखिका व समाज सुधारक)
मुख्य विधाएँउपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, संपादकीय
साहित्यिक काल/धाराआधुनिक काल (आदर्शोन्मुख यथार्थवाद)
प्रसिद्ध उपन्यासगोदान, गबन, सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि, निर्मला
प्रसिद्ध कहानियाँकफ़न, ईदगाह, पूस की रात, दो बैलों की कथा, पंच परमेश्वर, नमक का दारोगा
संपादित पत्रिकाएँहंस, माधुरी, मर्यादा, जागरण
मृत्यु तिथि8 अक्टूबर 1936 (वाराणसी)

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी (बनारस) जिले के निकट स्थित ‘लमही’ नामक छोटे से गाँव में हुआ था। वे एक सामान्य कायस्थ परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके दादाजी मुंशी गुरु सहाय लाल पटवारी थे और पिता मुंशी अजायब लाल डाक विभाग में एक सामान्य क्लर्क (मुंशी) के पद पर कार्यरत थे।

माता-पिता ने उनका नाम ‘धनपत राय’ रखा था, जबकि उनके चाचा प्यार से उन्हें ‘नवाब राय’ कहकर पुकारते थे। बाद में जब उन्होंने उर्दू में लिखना शुरू किया, तो ‘नवाब राय’ नाम से ही अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाते थे।

बचपन का संघर्ष और मातृ-वियोग

प्रेमचंद का बचपन अत्यधिक कष्टों और अभावों के बीच बीता। जब वे मात्र आठ वर्ष के थे, तभी उनकी माँ आनंदी देवी का एक लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। माँ के असमय चले जाने से बालक धनपत राय के जीवन में एक गहरा सूनापन आ गया। कुछ समय बाद पिता ने दूसरा विवाह कर लिया, लेकिन विमाता (सौतेली माँ) से उन्हें वह वात्सल्य और स्नेह नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। इस पारिवारिक उपेक्षा और अकेलेपन ने उन्हें अंतर्मुखी बना दिया, और उन्होंने पुस्तकों को ही अपना सच्चा मित्र बना लिया।

जब वे 15 वर्ष के थे, तब उनके पिता ने उनका विवाह एक ऐसी कन्या से कर दिया जो स्वभाव और विचारों में उनके सर्वथा विपरीत थी। यह बाल-विवाह पूरी तरह असफल रहा और प्रेमचंद के मानसिक क्लेश का कारण बना। विडंबना यह रही कि विवाह के एक वर्ष बाद (1897 में) उनके पिता का भी देहांत हो गया। उस समय प्रेमचंद नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। 16 वर्ष की अल्पायु में ही पूरे परिवार (विमाता और सौतेले भाइयों) के भरण-पोषण का भार उनके कंधों पर आ पड़ा।

शिक्षा और आजीविका का कठिन संघर्ष

पिता की मृत्यु के बाद प्रेमचंद पर आर्थिक संकट का पहाड़ टूट पड़ा। घर में अन्न का दाना नहीं था, पहनने के लिए ठीक से कपड़े नहीं थे और पाँव में फटे जूते थे। इन विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी।

वे ट्यूशन पढ़ाकर प्रतिमाह पाँच रुपये कमाते थे, जिसमें से अधिकांश पैसे घर के खर्च के लिए भेज देते थे। कई बार ऐसा होता था कि वे दिन भर में केवल एक वक्त का भोजन चने खाकर करते और मीलों पैदल चलकर स्कूल और ट्यूशन जाते। उन्होंने 1898 में द्वितीय श्रेणी से मैट्रिक (हाईस्कूल) की परीक्षा उत्तीर्ण की।

आगे चलकर तमाम संघर्षों के बीच उन्होंने 1919 में अंग्रेजी, फारसी और इतिहास विषयों के साथ बी.ए. (B.A.) की डिग्री प्राप्त की। शिक्षा पूरी करने के बाद वे शिक्षा विभाग में शिक्षक नियुक्त हुए और बाद में तरक्की पाकर ‘डिप्टी सब-इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स’ (स्कूल इंस्पेक्टर) के पद तक पहुँचे।

‘धनपत राय’ से ‘मुंशी प्रेमचंद’ बनने का सफर

साहित्यिक जगत में यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि धनपत राय ‘प्रेमचंद’ कैसे बने? इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक घटना जुड़ी है:

  1. ‘नवाब राय’ के नाम से उर्दू लेखन: शुरुआत में प्रेमचंद उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखते थे। 1908 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘सोज़े-वतन’ (देश का दर्द) प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की कहानियों में देशभक्ति, आज़ादी की तड़प और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ तीखा आक्रोश था।

  2. अंग्रेजी सरकार की पाबंदी: उस समय कानपुर के जिला मजिस्ट्रेट ने ‘सोज़े-वतन’ को देशद्रोही रचना घोषित कर दिया। प्रेमचंद को तलब किया गया और चेतावनी दी गई कि यदि दोबारा ऐसा लिखा तो जेल भेज दिया जाएगा। ‘सोज़े-वतन’ की सभी उपलब्ध 500 प्रतियों को सरेआम आग के हवाले कर दिया गया।

  3. ‘प्रेमचंद’ नाम का जन्म: सरकारी सेवा में रहते हुए बिना अनुमति लिखना संभव नहीं था। तब उनके अभिन्न मित्र और ‘ज़माना’ पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें एक नया छद्म नाम सुझाया— ‘प्रेमचंद’। इसके बाद उन्होंने ‘प्रेमचंद’ नाम से लिखना शुरू किया और आजीवन इसी नाम से अमर रहे।

  4. ‘मुंशी’ शब्द कैसे जुड़ा? उस दौर में अध्यापकों और सम्माननीय लेखकों के नाम के आगे ‘मुंशी’ सम्मानसूचक शब्द लगाने की परंपरा थी। बाद में जब वे ‘हंस’ पत्रिका का संपादन कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के. एम. मुंशी) के साथ संयुक्त रूप से करते थे, तो मुखपृष्ठ पर ‘मुंशी, प्रेमचंद’ छपता था, जो धीरे-धीरे जनमानस में ‘मुंशी प्रेमचंद’ के रूप में रूढ़ हो गया।

दूसरा विवाह और सामाजिक क्रांति : शिवरानी देवी का आगमन

प्रेमचंद केवल कागजी उपदेशक नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपने सिद्धांतों को निजी जीवन में जीकर दिखाया। अपने पहले असफल विवाह के कड़वे अनुभवों के बाद, 1906 में उन्होंने शिवरानी देवी से दूसरा विवाह किया।

शिवरानी देवी एक बाल-विधवा थीं। उस दौर के कट्टरपंथी समाज में किसी विधवा से विवाह करना एक सामाजिक क्रांति और भारी विद्रोह के समान था। प्रेमचंद ने सामाजिक रूढ़ियों और बिरादरी के बहिष्कार की परवाह न करते हुए यह कदम उठाया। शिवरानी देवी एक विदुषी और स्वाभिमानी महिला थीं। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में जेल यात्राएं भी कीं और प्रेमचंद के जीवन पर आधारित प्रसिद्ध पुस्तक ‘प्रेमचंद घर में’ लिखी, जो प्रेमचंद के अंतरंग व्यक्तित्व को जानने का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है।

राष्ट्रीय आंदोलन और सरकारी नौकरी का त्याग

1921 में जब महात्मा गांधी ने देशव्यापी ‘असहयोग आंदोलन’ (Non-Cooperation Movement) का आह्वान किया और गोरखपुर में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया, तो प्रेमचंद उनके विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए। गांधी जी के स्वदेशी और सरकारी संस्थाओं के बहिष्कार के आह्वान पर प्रेमचंद ने अपनी 20 वर्ष पुरानी सुरक्षित सरकारी नौकरी (डिप्टी इंस्पेक्टर पद) से तुरंत इस्तीफा दे दिया।

सरकारी पेंशन और नियमित वेतन का त्याग करके उन्होंने अपना शेष जीवन पूर्णकालिक रूप से साहित्य, पत्रकारिता और राष्ट्रसेवा को समर्पित कर दिया। उन्होंने बनारस में ‘सरस्वती प्रेस’ की स्थापना की और ‘हंस’ तथा ‘जागरण’ जैसी वैचारिक पत्रिकाओं का संपादन शुरू किया। हालांकि प्रेस और पत्रिकाओं के संचालन के कारण वे आजीवन कर्ज के बोझ तले दबे रहे, लेकिन उन्होंने राष्ट्र चेतना जगाने का अभियान कभी बंद नहीं किया।

मुंशी प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएँ (Comprehensive Works Table)

मुंशी प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, तीन नाटक, कई निबंध और अनगिनत संपादकीय लेख लिखे। उनकी कहानियाँ ‘मानसरोवर’ के आठ खंडों और ‘गुप्त धन’ के दो खंडों में संकलित हैं।

1. प्रमुख उपन्यास (Novels)

उपन्यास का नामप्रकाशन वर्षकेंद्रीय विषय / सामाजिक पृष्ठभूमि
सेवासदन1918वेश्यावृत्ति की समस्या, नारी उद्धार और दहेज प्रथा
प्रेमाश्रम1922जमींदारी व्यवस्था और किसानों के शोषण का यथार्थ
रंगभूमि1925औद्योगीकरण के विरुद्ध ग्रामीण संस्कृति और सूरदास का संघर्ष
कायाकल्प1926पुनर्जन्म, आध्यात्मिक रहस्य और सामंती व्यवस्था
निर्मला1927अनमेल विवाह और दहेज प्रथा की शिकार भारतीय नारी की करुण त्रासदी
प्रतिज्ञा1929विधवा-विवाह और नारी शिक्षा का समर्थन
गबन1931आभूषणों के प्रति अंध-आकर्षण, मिथ्या प्रदर्शन और नैतिक पतन
कर्मभूमि1932अछूतोद्धार, जातिवाद और स्वाधीनता संग्राम में युवाओं की भूमिका
गोदान1936भारतीय किसान ‘होरी’ की अमर महागाथा, महाजनी सभ्यता का नंगा सच
मंगलसूत्र1936 (अपूर्ण)लेखक का अंतिम उपन्यास (जिसे उनके पुत्र अमृतराय ने पूर्ण किया)

2. कालजयी और प्रसिद्ध कहानियाँ (Famous Short Stories)

  • ईदगाह: नन्हे हामिद और उसकी दादी अमीना के असीम प्रेम और बाल मनोविज्ञान की अमर कहानी।

  • कफ़न: घीसू और माधव के माध्यम से घोर दरिद्रता द्वारा मानवीय संवेदनाओं के मर जाने का क्रूर यथार्थ।

  • पूस की रात: हल्कू किसान और उसके कुत्ते जबरा के जरिए कड़कड़ाती ठंड और ऋणग्रस्त किसान की विवशता।

  • दो बैलों की कथा: हीरा और मोती नामक दो बैलों के माध्यम से स्वतंत्रता और स्वाभिमान का संदेश।

  • पंच परमेश्वर: जुम्मन शेख और अलगू चौधरी की न्यायप्रियता और मित्रता की मिसाल।

  • नमक का दारोगा: पंडित अलोपीदीन और वंशीधर के जरिए सत्य, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी की विजय।

  • बूढ़ी काकी: उपेक्षित और असहाय वृद्धों के प्रति परिवार की क्रूरता का मार्मिक चित्रण।

  • शतरंज के खिलाड़ी: नवाब वाजिद अली शाह के दौर में लखनऊ की विलासिता और राष्ट्रीय पतन का दस्तावेज।

  • ठाकुर का कुआँ: जातिवाद और अस्पृश्यता के अमानवीय चेहरे पर करारा तमाचा।

  • बड़े घर की बेटी: संयुक्त परिवार को टूटने से बचाने वाली समझदार स्त्री की गाथा।

3. नाटक एवं वैचारिक निबंध

  • नाटक: कर्बला (1924), संग्राम (1923), प्रेम की वेदी (1933)।

  • निबंध संग्रह: कुछ विचार, साहित्य का उद्देश्य।

मुंशी प्रेमचंद की साहित्यिक विशेषताएँ एवं लेखन शैली

प्रेमचंद का साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि वह समाज को बदलने का एक सशक्त हथियार है। उनकी प्रमुख साहित्यिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. आदर्शोन्मुख यथार्थवाद (Idealistic Realism)

प्रेमचंद की सबसे बड़ी मौलिक देन है— ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’। इसका अर्थ है कि वे समाज की बुराइयों, दरिद्रता और शोषण का नग्न यथार्थ तो दिखाते हैं, लेकिन कहानी का अंत निराशा में नहीं करते, बल्कि हृदय-परिवर्तन और नैतिक आदर्श की स्थापना के साथ करते हैं। हालांकि अपने अंतिम दौर की रचनाओं (जैसे ‘गोदान’ और ‘कफ़न’) में वे घोर यथार्थवादी हो गए थे।

2. शोषित और ग्रामीण भारत की आवाज

प्रेमचंद से पूर्व हिंदी साहित्य शहरों और राजाओं तक सीमित था। प्रेमचंद ने खेत-खलिहान, खलिहानों के मजदूर, दलित, उपेक्षित नारियों और कर्ज में डूबे किसानों को साहित्य का नायक बनाया। ‘गोदान’ का होरी केवल एक पात्र नहीं, बल्कि समूचे भारत के शोषित किसान का जीवंत प्रतीक है।

3. सरल, मुहावरेदार और हिंदुस्तानी भाषा

प्रेमचंद ने संस्कृतनिष्ठ क्लिष्ट हिंदी या कठिन अरबी-फारसी के बजाय आम जनता की बोलचाल वाली ‘हिंदुस्तानी भाषा’ का प्रयोग किया। उनकी भाषा में लोकोक्तियों और मुहावरों का सटीक प्रयोग पाठक को सीधे दिल से जोड़ता है।

4. मनोवैज्ञानिक चरित्र-चित्रण

वे पात्रों के अंतर्मन को गहराई से पकड़ते थे। चाहे ‘ईदगाह’ में तीन पैसे के चिमटे से हामिद की बाल-सुलभ परिपक्वता दिखाना हो या ‘बूढ़ी काकी’ में भूख की लाचारी, उनका मनोवैज्ञानिक चित्रण अद्वितीय है।

प्रगतिशील लेखक संघ और अंतिम ऐतिहासिक भाषण

1936 में लखनऊ में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ (Progressive Writers’ Association) का प्रथम ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ। मुंशी प्रेमचंद को इस सम्मेलन का पहला अध्यक्ष चुना गया।

इस सम्मेलन में दिया गया उनका अध्यक्षीय भाषण हिंदी आलोचना और साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की थी:

“साहित्य केवल मनोरंजन और विलास की सामग्री नहीं है। साहित्य का उद्देश्य हमारी अनुभूतियों को तीव्र करना, हमारे भीतर सत्य और न्याय के प्रति प्रेम जगाना है। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो और जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो—जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं।”

जीवन का अंतिम समय और महाप्रयाण

लगातार आर्थिक तंगी, अत्यधिक श्रम, सरस्वती प्रेस का घाटा और पत्रिकाओं की चिंता ने प्रेमचंद के स्वास्थ्य को पूरी तरह तोड़ दिया था। उन्हें पेट में अल्सर (जलोदर/ड्रॉपसी) की गंभीर बीमारी हो गई।

अंतिम दिनों में मुंबई जाकर उन्होंने ‘मिल मजदूर’ फिल्म की पटकथा भी लिखी, लेकिन सिनेमा जगत की व्यावसायिकता और समझौतेवादी माहौल में उनका संवेदनशील मन नहीं लगा और वे वापस बनारस लौट आए।

बीमारी की असह्य पीड़ा के बीच भी वे अपने अंतिम उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ को पूरा करने में जुटे रहे। अंततः 8 अक्टूबर 1936 को 56 वर्ष की आयु में इस महान साहित्यकार ने सदा के लिए आँखें मूँद लीं। उनका अधूरा उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ बाद में उनके सुपुत्र अमृतराय ने पूरा करके प्रकाशित करवाया।

परीक्षा उपयोगी संक्षिप्त परिचय (Exam Notes: 80-100 Words)

मुंशी प्रेमचंद (1880–1936): हिंदी साहित्य के युगप्रवर्तक कथाकार और ‘उपन्यास सम्राट’ मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को लमही (वाराणसी) में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय था। उन्होंने जीवन भर निर्धनता और सामाजिक विसंगतियों से संघर्ष करते हुए साहित्य को जन-आंदोलन का रूप दिया। उनके प्रमुख उपन्यासों में गोदान, गबन, सेवासदन, निर्मला, रंगभूमि तथा प्रसिद्ध कहानियों में ईदगाह, कफ़न, पूस की रात, पंच परमेश्वर अमर हैं। उन्होंने ‘हंस’ पत्रिका का संपादन किया। 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हुआ। वे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के प्रवर्तक माने जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्र.1. मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम क्या था?

उत्तर: मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से और हिंदी में ‘प्रेमचंद’ के नाम से लिखते थे।

प्र.2. प्रेमचंद को ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि किसने दी थी?

उत्तर: मुंशी प्रेमचंद को ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि प्रसिद्ध बाँग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उनके अद्वितीय कथा-शिल्प और यथार्थवादी लेखन को देखकर दी थी।

प्र.3. प्रेमचंद का अंतिम और सबसे प्रसिद्ध उपन्यास कौन-सा है?

उत्तर: प्रेमचंद का सबसे प्रसिद्ध और कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ (1936) है, जिसे भारतीय कृषक जीवन का महाकाव्य कहा जाता है। उनका अंतिम अपूर्ण उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ था, जिसे उनके पुत्र अमृतराय ने पूर्ण किया।

प्र.4. प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह कौन-सा था और उसे क्यों जब्त किया गया?

उत्तर: प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह ‘सोज़े-वतन’ (1908) था, जो उर्दू में ‘नवाब राय’ नाम से छपा था। इसमें देशप्रेम और स्वाधीनता की भावना से ओतप्रोत कहानियाँ होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त करके इसकी सभी प्रतियाँ जला दी थीं।

प्र.5. प्रेमचंद की कहानियाँ किस संकलन में संग्रहित हैं?

उत्तर: मुंशी प्रेमचंद की लगभग 300 से अधिक कहानियाँ ‘मानसरोवर’ शीर्षक के आठ खंडों में तथा कुछ अन्य रचनाएँ ‘गुप्त धन’ के दो खंडों में संकलित हैं।

प्र.6. प्रेमचंद ने किन प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया था?

उत्तर: प्रेमचंद ने मुख्य रूप से ‘हंस’, ‘जागरण’, ‘माधुरी’ और ‘मर्यादा’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया था।

प्र.7. ‘कलम का सिपाही’ जीवनी किसने लिखी है?

उत्तर: मुंशी प्रेमचंद की प्रमाणिक और प्रसिद्ध जीवनी ‘कलम का सिपाही’ उनके सुपुत्र अमृतराय द्वारा लिखी गई है, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

निष्कर्ष (Conclusion)

मुंशी प्रेमचंद केवल अतीत के रचनाकार नहीं हैं, बल्कि आज के दौर में भी उनकी प्रासंगिकता उतनी ही जीवंत है। जब तक समाज में किसान की बेबसी, जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिकता, नारी उत्पीड़न और पूंजीवादी शोषण रहेगा, तब तक प्रेमचंद का साहित्य मानवता को आईना दिखाता रहेगा और संघर्ष की प्रेरणा देता रहेगा। उनका जीवन इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि साधनहीनता कभी प्रतिभा और जन-सरोकारों की राह में बाधा नहीं बन सकती।

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