प्रकृति और इंसान के रिश्ते पर जब भी बात होती है, तो अक्सर जंगलों की कटाई, प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग की चिंताएं ही सामने आती हैं। लेकिन भारत की पावन भूमि पर एक ऐसे असाधारण इंसान ने जन्म लिया, जिसने बिना किसी सरकारी बजट, बिना आधुनिक मशीनों और बिना किसी की मदद के अकेले अपने दम पर ब्रह्मपुत्र नदी के बंजर रेतीले टापू को 1,360 एकड़ के घने जंगल में तब्दील कर दिया।
हम बात कर रहे हैं असम के जोरहाट जिले के रहने वाले जादव ‘मोलाई’ पायेंग (Jadav Payeng) की, जिन्हें पूरी दुनिया “फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया” (Forest Man of India) के नाम से जानती है।
इस लेख में हम जादव पायेंग के प्रारंभिक जीवन, 1979 की उस झकझोर देने वाली घटना, 4 दशकों के अथक संघर्ष, मोलाई फॉरेस्ट के निर्माण, पर्यावरण को उनके योगदान और उनके जीवन से मिलने वाले बहुमूल्य सबकों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
जादव पायेंग: संक्षिप्त परिचय (Quick Overview)
1979 की वह घटना जिसने पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी
जादव पायेंग का जन्म असम के मिसिंग आदिवासी समुदाय में हुआ था। उनका बचपन ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे प्रकृति की गोद में बीता। उनका परिवार पशुपालन और दूध बेचकर अपना गुजारा करता था।
साल 1979 में जब जादव मात्र 16 वर्ष के थे, तब असम में ब्रह्मपुत्र नदी में भीषण बाढ़ आई। बाढ़ का पानी जब उतरा, तो जोरहाट के पास ‘अरूणा चापोरी’ नामक एक विशाल रेतीला टीला (Sandbar) पूरी तरह वीरान और तपता हुआ नजर आया।
एक दिन जब जादव उस बंजर रेत पर टहल रहे थे, तो उन्होंने देखा कि बाढ़ के पानी के साथ बहकर आए सैकड़ों सांप और अन्य सरीसृप धूप की प्रचंड तपिश और छांव न होने के कारण तड़प-तड़प कर मर चुके थे।
इस दृश्य ने 16 साल के जादव के दिल को अंदर तक झकझोर दिया। उन्होंने सोचा:
“अगर आज छांव और पेड़ों की कमी से ये बेजुबान जीव मर रहे हैं, तो कल जब इंसान इस तपिश की चपेट में आएगा, तब क्या होगा?”
जब जादव ने अपने गांव के बुजुर्गों और वन विभाग से इस बंजर जमीन पर पेड़ लगाने की गुहार लगाई, तो सबने हाथ खड़े कर दिए। लोगों ने कहा कि इस बंजर बालू पर कभी कोई पेड़ नहीं उग सकता। तब जादव पायेंग ने संकल्प लिया कि वे इस सूखी रेत को एक हरा-भरा जंगल बनाकर ही दम लेंगे।
बंजर रेत से घने जंगल तक: 4 दशकों का अद्वितीय संघर्ष
1. बांस के पौधों और लाल चींटियों से शुरुआत
जादव ने सबसे पहले बंजर रेत पर बांस (Bamboo) के पौधे लगाने शुरू किए, क्योंकि बांस किसी भी कठोर वातावरण में तेजी से पनप सकता है।
लेकिन केवल बांस लगाने से मिट्टी उपजाऊ नहीं हो सकती थी। मिट्टी की उर्वरता और नमी बढ़ाने के लिए जादव अपने गांव से लाल चींटियां (Red Ants), केंचुए और जैविक कचरा लाकर उस रेतीली जमीन में डालने लगे। लाल चींटियों के काटने से मिट्टी में हलचल हुई और धीरे-धीरे रेत उपजाऊ मिट्टी में बदलने लगी।
2. देसी ड्रिप इरिगेशन (घड़े और बांस की सिंचाई तकनीक)
गर्मियों के मौसम में सैकड़ों पौधों को पानी देना एक अकेले इंसान के लिए नामुमकिन था। जादव के पास कोई वाटर पंप या पाइपलाइन नहीं थी। उन्होंने एक पारंपरिक वैज्ञानिक तरीका निकाला:
उन्होंने मिट्टी के घड़ों के तल में छोटा सा छेद किया।
उसमें सूखी घास और पतली टहनियां लगाईं ताकि पानी बूंद-बूंद करके टपके।
इन घड़ों को बांस के मचान पर पौधों के ठीक ऊपर बांध दिया। इस स्वदेशी ‘ड्रिप इरिगेशन’ तकनीक से पौधों को कई दिनों तक लगातार नमी मिलती रही और वे सूखने से बच गए।
3. दिनचर्या और अथक परिश्रम
जादव रोजाना सुबह 3 से 4 बजे उठते, अपनी नाव से ब्रह्मपुत्र नदी पार करके रेतीले टापू पर पहुंचते, बीज बोते, पौधे लगाते और शाम तक उनकी देखभाल करते। वे अपनी आजीविका के लिए गाय-भैंस पालते थे, लेकिन उनका 80% समय केवल पेड़ों की सेवा में बीतता था।
‘मोलाई फॉरेस्ट’ की प्रमुख विशेषताएं और जैव विविधता
जादव पायेंग द्वारा उगाए गए इस जंगल का नाम स्थानीय लोगों और वन विभाग ने उनके उपनाम पर ‘मोलाई फॉरेस्ट’ (Molai Forest) रखा। यह जंगल न्यूयॉर्क के मशहूर ‘सेंट्रल पार्क’ (843 एकड़) से भी बड़ा है और लगभग 1,360 एकड़ में फैला हुआ है।
[मोलाई फॉरेस्ट का समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र]
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【वनस्पति संपदा】 【वन्यजीव संरक्षण】 【पर्यावरणीय संतुलन】
• 300+ हेक्टेयर बांस • 100+ जंगली हाथियों का झुंड • ब्रह्मपुत्र के कटाव पर रोक
• शीशम, सागौन, अर्जुन • बंगाल टाइगर और तेंदुए • माइक्रो-क्लाइमेट सुधार
• जामुन, इमली, कटहल • एक सींग वाले गैंडे • कार्बन अवशोषण (Carbon Sink)
वनस्पति (Flora):
अर्जुन, शीशम, सागौन (Teak), करंज और सेमल के विशाल वृक्ष।
जामुन, आम, इमली और कटहल जैसे फलदार पेड़ जो पक्षियों और जानवरों को भोजन देते हैं।
300 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला घना बांस का जंगल।
वन्यजीव (Fauna):
बंगाल टाइगर: इस जंगल में रॉयल बंगाल टाइगर और तेंदुए अपने स्वाभाविक आवास की तरह रहते हैं और प्रजनन करते हैं।
एशियाई हाथी: हर साल 100 से अधिक जंगली हाथियों का झुंड मोलाई फॉरेस्ट में 3 से 6 महीने तक शरण लेता है।
एक सींग वाला भारतीय गैंडा: काजीरंगा नेशनल पार्क से निकलकर गैंडे अक्सर इस जंगल में आते हैं।
पक्षी और सरीसृप: गिद्ध, हॉर्नबिल, बगुले और दर्जनों प्रजातियों के पक्षी और सांप यहां पाए जाते हैं।
दुनिया के सामने कैसे आया जादव पायेंग का यह अजूबा?
जादव पायेंग ने 30 सालों तक बिना किसी प्रचार या अखबार की सुर्खी के यह काम किया। दुनिया को 2008 तक इस विशाल जंगल की भनक तक नहीं थी।
2008 की घटना: काजीरंगा नेशनल पार्क से लगभग 115 हाथियों का एक झुंड रास्ता भटककर पास के गांवों में फसलों को नुकसान पहुंचाने लगा और फिर इस अज्ञात जंगल में गायब हो गया। जब असम वन विभाग के अधिकारी हाथियों का पीछा करते हुए वहां पहुंचे, तो वे 1,360 एकड़ में फैले घने जंगल को देखकर दंग रह गए।
जीतू कलिता का योगदान: साल 2009 में असम के एक वन्यजीव फोटोग्राफर और पत्रकार जीतू कलिता (Jitu Kalita) ने जादव पायेंग पर एक विस्तृत लेख लिखा। इसके बाद देश-विदेश का मीडिया जोरहाट पहुंचा और जादव की इस तपस्या की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देने लगी।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान ও पुरस्कार
जादव पायेंग के अभूतपूर्व योगदान को भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय मंचों द्वारा सराहा गया है:
जादव पायेंग के जीवन से मिलने वाले 5 बड़े सबक
अकेला व्यक्ति भी क्रांति ला सकता है: अक्सर लोग सोचते हैं कि अकेले क्या बदला जा सकता है। जादव ने साबित किया कि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो अकेला इंसान भी पूरा जंगल उगा सकता है।
प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व (Co-existence): जादव के जंगल में रहने वाले बाघों ने कई बार उनकी गायों का शिकार किया, लेकिन उन्होंने कभी जानवरों को नुकसान नहीं पहुंचाया। उनका मानना है कि जब हम प्रकृति का हिस्सा बनते हैं, तो कुछ त्याग स्वाभाविक है।
स्थानीय और स्वदेशी ज्ञान का महत्व: बिना किसी आधुनिक इंजीनियरिंग डिग्री के, उन्होंने घड़े की सिंचाई और चींटियों के जरिए मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने का जो तरीका अपनाया, वह आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए भी केस स्टडी है।
धैर्य और निरंतरता (Consistency): एक पेड़ को बड़ा होने में सालों लगते हैं। 40 से अधिक वर्षों तक प्रतिदिन बिना रुके काम करना सिखाता है कि बड़े बदलाव समय और निरंतर प्रयास मांगते हैं।
प्रकृति संरक्षण ही मानवता की सुरक्षा है: ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जादव पायेंग का काम सिर्फ एक जंगल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन रक्षक कवच है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
Q1. जादव पायेंग को ‘फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया’ का नाम किसने दिया?
उत्तर: वर्ष 2012 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली के तत्कालीन कुलपति सुधीर कुमार सोपोरी द्वारा जादव पायेंग को सार्वजनिक रूप से ‘फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
Q2. मोलाई फॉरेस्ट कहाँ स्थित है और इसका क्षेत्रफल कितना है?
उत्तर: मोलाई फॉरेस्ट भारत के असम राज्य में जोरहाट जिले के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के कोकिलामुख के पास स्थित है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1,360 एकड़ (550 हेक्टेयर) है।
Q3. जादव पायेंग ने पेड़ लगाना कब और क्यों शुरू किया था?
उत्तर: उन्होंने वर्ष 1979 में 16 वर्ष की उम्र में पेड़ लगाना शुरू किया था। 1979 की बाढ़ के बाद रेतीले तट पर तेज धूप के कारण सैकड़ों सांपों की मौत देखकर वे बेहद व्यथित हुए और उन्होंने इस बंजर भूमि को हरा-भरा करने का संकल्प लिया।
Q4. जादव पायेंग को पद्म श्री पुरस्कार कब मिला था?
उत्तर: भारत सरकार ने पर्यावरण संरक्षण में उनके असाधारण योगदान के लिए वर्ष 2015 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया।
Q5. क्या मोलाई फॉरेस्ट में जंगली जानवर भी रहते हैं?
उत्तर: हाँ, मोलाई फॉरेस्ट में बंगाल टाइगर, तेंदुए, एक सींग वाले भारतीय गैंडे, 100 से अधिक एशियाई हाथियों का झुंड, हिरण, गिद्ध, और कई दुर्लभ प्रजातियों के पक्षी तथा सरीसृप स्वाभाविक रूप से निवास करते हैं।
Q6. जादव पायेंग वर्तमान में किस वैश्विक परियोजना पर काम कर रहे हैं?
उत्तर: जादव पायेंग भारत के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वनीकरण अभियानों में भाग ले रहे हैं। उन्होंने मेक्सिको में एक गैर-सरकारी संगठन के साथ मिलकर 8 लाख हेक्टेयर भूमि पर पेड़ लगाने के वैश्विक प्रोजेक्ट के साथ सहयोग किया है।
निष्कर्ष: जादव पायेंग का संदेश
जादव ‘मोलाई’ पायेंग केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता पर्यावरण संस्थान हैं। वे आज भी कहते हैं कि:
“अगर हर बच्चा अपने जन्मदिन या स्कूल में प्रवेश के समय केवल दो पेड़ लगाए और 5 साल तक उनकी देखभाल करे, तो दुनिया को कभी ग्लोबल वार्मिंग का सामना नहीं करना पड़ेगा।”
जादव पायेंग की यह सच्ची दास्तान हमें याद दिलाती है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो बंजर रेत पर भी हरियाली का स्वर्ग रचा जा सकता है। आइए हम सब उनके जीवन से प्रेरणा लें और अपनी धरती को हरा-भरा बनाने में अपना छोटा सा योगदान अवश्य दें।

