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पृथ्वीराज चौहान का इतिहास: जीवन, साम्राज्य, युद्ध और तराइन की लड़ाई

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भारतीय इतिहास के पन्नों में महाराजा पृथ्वीराज चौहान तृतीय (Prithviraj Chauhan III) का नाम एक ऐसे पराक्रमी योद्धा के रूप में दर्ज है, जिन्होंने मध्यकालीन भारत में विदेशी आक्रांताओं के दांत खट्टे कर दिए थे। वे शाकंभरी (सांभर) और अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के अंतिम और सबसे प्रसिद्ध हिंदू सम्राट थे।

उन्होंने 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्तर भारत के एक विशाल भूभाग पर शासन किया, जिसमें वर्तमान राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल थे। आइए, भारत के इस महान राजपूत योद्धा के जीवन, उनकी विजयों, संयोगिता के साथ उनकी प्रेम कहानी और तराइन के ऐतिहासिक युद्धों का विस्तृत प्रामाणिक इतिहास जानते हैं।

पृथ्वीराज चौहान: एक दृष्टि में (Quick Overview Table)

विषय / विवरणऐतिहासिक जानकारी
पूरा नामपृथ्वीराज चौहान तृतीय (Prithviraj III)
अन्य नामराय पिथोरा (Rai Pithora)
जन्म तिथि / वर्षलगभग 1166 ईस्वी (ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी)
जन्म स्थानअनहिलवाड़ा (पाटन, गुजरात)
पिता का नामसोमेश्वर चौहान
माता का नामकर्पूरी देवी (कलचुरी राजकुमारी)
राजवंशचाहमान (चौहान) राजवंश
राजधानीअजयमेरु (अजमेर) और दिल्ली
प्रसिद्ध दरबारी कविचंदबरदाई (ग्रंथ: पृथ्वीराज रासो)
प्रमुख युद्धतराइन का प्रथम युद्ध (1191), तराइन का द्वितीय युद्ध (1192)

1. प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

पृथ्वीराज चौहान का जन्म लगभग 1166 ईस्वी में गुजरात के पाटन (अनहिलवाड़ा) में हुआ था। उस समय उनके पिता सोमेश्वर चौहान गुजरात के चालुक्य दरबार में निवास करते थे। उनकी माता कर्पूरी देवी मध्य भारत के चेदि (कलचुरी) साम्राज्य की राजकुमारी थीं।

पृथ्वीराज बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि, साहसी और युद्ध कला में निपुण थे। 12वीं शताब्दी के संस्कृत महाकाव्य ‘पृथ्वीराज विजय’ के अनुसार, वे शस्त्र संचालन, धनुर्विद्या, घुड़सवारी और हाथी संचालन में माहिर थे। कहा जाता है कि वे छह भाषाओं के ज्ञाता थे और उन्हें ‘शब्दभेदी बाण’ (केवल आवाज सुनकर सटीक निशाना लगाने की कला) विद्या में भी महारत हासिल थी।

राज्याभिषेक और अल्पायु में सत्ता संभालना

1177 ईस्वी में जब उनके पिता राजा सोमेश्वर का निधन हुआ, उस समय पृथ्वीराज की आयु मात्र 11 वर्ष थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने अजमेर की गद्दी संभाली। शुरुआत में उनकी माता महारानी कर्पूरी देवी ने एक कुशल संरक्षिका (Regent) के रूप में शासन चलाया, जिसमें उनके मुख्यमंत्री कदंबवास (कावास) और सेनापति भुवनैकमल्ल ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। 1180 ईस्वी के आसपास पृथ्वीराज ने पूर्ण रूप से साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

2. प्रारंभिक सैन्य अभियान और साम्राज्य विस्तार

पूर्ण सत्ता संभालते ही पृथ्वीराज चौहान ने अपने साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित और विस्तारित करने के लिए एक आक्रामक नीति अपनाई:

नागार्जुन के विद्रोह का दमन (1180 ई.)

पृथ्वीराज के गद्दी पर बैठते ही उनके चचेरे भाई नागार्जुन ने गुड़गांव (वर्तमान गुरुग्राम) पर अधिकार कर लिया और विद्रोह कर दिया। पृथ्वीराज ने बिना समय गंवाए गुड़गांव पर हमला किया और नागार्जुन के विद्रोह को पूरी तरह कुचल दिया। इस विजय ने पृथ्वीराज की सैन्य शक्ति का लोहा मनवाया।

भदानकों का विनाश (1182 ई.)

भदानक एक आक्रामक कबीलाई जाति थी जो अलवर और भरतपुर के आसपास के क्षेत्रों में उपद्रव मचाती थी और चौहान साम्राज्य के लिए खतरा बनी हुई थी। 1182 ईस्वी में पृथ्वीराज ने भदानकों पर जोरदार आक्रमण किया और उन्हें हमेशा के लिए परास्त कर दिया, जिससे चौहान साम्राज्य की उत्तरी सीमा सुरक्षित हो गई।

चंदेलों के खिलाफ अभियान (महोबा का युद्ध)

उत्तर भारत में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए पृथ्वीराज ने बुंदेलखंड के चंदेल शासक परमार्दिदेव (परमाल) पर आक्रमण किया। महोबा के इस युद्ध में चंदेल राजा के दो प्रसिद्ध वीर सेनापति आल्हा और ऊदल वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस विजय के बाद पृथ्वीराज ने महोबा पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।

चालुक्यों और गहड़वालों से संघर्ष

  • गुजरात के चालुक्य: गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय के साथ चौहानों का सीमा विवाद था। दोनों के बीच कई झड़पें हुईं, लेकिन बाद में दोनों पक्षों ने शांति समझौता कर लिया।

  • कन्नौज के गहड़वाल: कन्नौज का राजा जयचंद राठौड़ उत्तर भारत का एक अन्य शक्तिशाली शासक था। पृथ्वीराज के बढ़ते प्रभाव से जयचंद ईर्ष्या करता था। दोनों राजाओं की महत्वाकांक्षाओं के कारण चौहानों और गहड़वालों के बीच शत्रुता पैदा हो गई।

3. पृथ्वीराज और संयोगिता की प्रेम कहानी: सत्य या किंवदंती?

पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता (तिलोत्तमा) की प्रेम कहानी भारतीय लोककथाओं का एक अभिन्न हिस्सा है। इसका मुख्य विवरण चंदबरदाई के ग्रंथ ‘पृथ्वीराज रासो’ में मिलता है।

स्वयंवर और अपहरण की घटना

कथा के अनुसार, राजा जयचंद ने अपनी सर्वोच्चता साबित करने के लिए ‘राजसूय यज्ञ’ और अपनी पुत्री संयोगिता के लिए ‘स्वयंवर’ का आयोजन किया। जयचंद ने भारत के सभी राजाओं को आमंत्रित किया, लेकिन पृथ्वीराज को नीचा दिखाने के लिए उन्हें निमंत्रण नहीं भेजा और महल के द्वार पर पृथ्वीराज की एक द्वारपाल के रूप में मूर्ति खड़ी कर दी।

संयोगिता, जो पृथ्वीराज की वीरता की कहानियां सुनकर मन ही मन उन्हें अपना पति मान चुकी थी, उसने स्वयंवर में उपस्थित सभी राजाओं को छोड़कर द्वार पर रखी पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में वरमाला डाल दी। ठीक उसी समय पृथ्वीराज चौहान वहां पहुंचे और संयोगिता को अपने घोड़े पर बिठाकर अजमेर ले आए और उनसे विवाह कर लिया।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण

आधुनिक इतिहासकारों (जैसे डॉ. जी.एच. ओझा) का मानना है कि संयोगिता की कहानी का उल्लेख ‘पृथ्वीराज विजय’ या अन्य समकालीन मुस्लिम ग्रंथों में नहीं मिलता है। हालांकि, यह कहानी चौहान और गहड़वाल वंश के बीच की कटु शत्रुता को दर्शाती है, जिसने बाद में भारतीय इतिहास को गहराई से प्रभावित किया।

4. विदेशी आक्रमणकारी मोहम्मद गोरी का आगमन

12वीं शताब्दी के अंत में, अफगानिस्तान के घोर प्रांत का शासक शीहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी भारत पर अपने साम्राज्य का विस्तार करने और धन लूटने के इरादे से आगे बढ़ा।

1175 ईस्वी में उसने मुल्तान और उच्छ पर कब्जा किया। 1178 ईस्वी में उसने गुजरात के चालुक्यों पर हमला किया, लेकिन रानी नायकी देवी और भीमदेव द्वितीय ने आबू पर्वत के पास कायदरा के युद्ध में गोरी को बुरी तरह पराजित किया। इस पराजय के बाद गोरी ने अपना मार्ग बदला और पंजाब एवं सिंध के रास्ते उत्तर भारत में प्रवेश करने की योजना बनाई।

पंजाब पर अधिकार करने के बाद मोहम्मद गोरी की सीमाएं पृथ्वीराज चौहान के साम्राज्य की सीमाओं से टकराने लगीं। गोरी ने सरहिंद (तबरहिंद) के किले पर कब्जा कर लिया, जो पृथ्वीराज के क्षेत्र के अत्यंत करीब था। इससे दोनों महाशक्तियों के बीच सीधा टकराव अवश्यंभावी हो गया।

5. तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ईस्वी)

सरहिंद पर गोरी के कब्जे की खबर मिलते ही पृथ्वीराज चौहान एक विशाल सेना लेकर आगे बढ़े। दिल्ली के तोमर शासक गोविंद राय और अन्य राजपूत सामंत भी पृथ्वीराज के साथ शामिल हुए। 1191 ईस्वी में करनाल (हरियाणा) के पास तराइन (तराओरी) के मैदान में दोनों सेनाओं का आमना-सामना हुआ।

युद्ध का घटनाक्रम और राजपूतों की विजय

  • पृथ्वीराज चौहान की घुड़सवार सेना और हाथियों के दस्ते ने गोरी की मध्य टुकड़ी पर भीषण प्रहार किया।

  • दिल्ली के राजा गोविंद राय ने अपने भाले के वार से मोहम्मद गोरी को गंभीर रूप से घायल कर दिया और उसके दांत तोड़ दिए।

  • गोरी घोड़े से गिरने ही वाला था कि उसके एक वफादार खिलजी सैनिक ने उसे अपने घोड़े पर संभाला और युद्ध के मैदान से सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

  • सेनापति के घायल होते ही तुर्की सेना में भगदड़ मच गई। राजपूत सेना ने गोरी की सेना का पीछा किया और उन्हें खदेड़ दिया।

पृथ्वीराज की ऐतिहासिक उदारता (उदारता या भूल?)

तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पूर्ण विजय हुई। हालांकि, राजपूत युद्ध-नीति के अनुसार उन्होंने भागती हुई तुर्की सेना पर पीछे से हमला नहीं किया और घायल गोरी को जीवित वापस जाने दिया। अनेक इतिहासकार इसे पृथ्वीराज की एक बड़ी रणनीतिक भूल मानते हैं, क्योंकि गोरी ने वापस जाकर पुनः संगठित होने का अवसर पा लिया।

6. तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ईस्वी) – भारत का निर्णायक मोड़

तराइन की हार से मोहम्मद गोरी तिलमिला उठा था। उसने गजनी लौटकर एक वर्ष तक कठोर सैन्य तैयारी की। उसने 1,20,000 सुसज्जित घुड़सवारों की एक शक्तिशाली सेना तैयार की, जिसमें तीरंदाज और बख्तरबंद घुड़सवार शामिल थे।

1192 ईस्वी में गोरी फिर से तराइन के मैदान में आ डटा। जब पृथ्वीराज ने उससे संधि का प्रस्ताव भेजा, तो गोरी ने कूटनीति का सहारा लिया और बातचीत में राजपूतों को उलझाए रखा।

तुर्की कूटनीति और राजपूतों की पराजय

  • छल का प्रहार: गोरी ने राजपूतों को भ्रम में रखा कि वह अपने भाई से सलाह ले रहा है। लेकिन रात के अंधेरे में उसने अपनी सेना को चार भागों में बांटा और सुबह तड़के (जब राजपूत सैनिक दैनिक क्रियाओं में व्यस्त थे) अचानक हमला बोल दिया।

  • युद्ध रणनीति में अंतर: तुर्की सेना के पास गतिशील धनुर्धारी घुड़सवार (Horse Archers) थे, जो दूर से ही तीर बरसाकर भाग जाते थे। राजपूतों की पारंपरिक सेना (हाथी और भारी पैदल सैनिक) इस आधुनिक और तेज गति वाली छापामार रणनीति का मुकाबला नहीं कर सकी।

  • आंतरिक फूट: जयचंद और अन्य क्षेत्रीय राजाओं का सहयोग न मिलना भी चौहान साम्राज्य के लिए भारी पड़ा।

परिणामस्वरूप, राजपूत सेना में अव्यवस्था फैल गई। दिल्ली के राजा गोविंद राय युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना लिया गया। तराइन के इस द्वितीय युद्ध ने भारत में तुर्की शासन (और बाद में दिल्ली सल्तनत) की स्थापना के द्वार खोल दिए।

7. पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु: तथ्य और जनश्रुतियाँ

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु को लेकर मुख्य रूप से दो मत प्रचलित हैं:

1. ‘पृथ्वीराज रासो’ का विवरण (शब्दभेदी बाण की जनश्रुति)

चंदबरदाई के अनुसार, मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज को बंदी बनाकर गजनी ले गया और वहां उनकी आंखें फोड़ दीं। चंदबरदाई भी किसी तरह गजनी पहुंचा। वहां एक बाणविद्या प्रदर्शन का आयोजन किया गया। चंदबरदाई ने एक प्रसिद्ध दोहा पढ़ा:

“चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।

ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।।”

इस दोहे के माध्यम से पृथ्वीराज को गोरी के बैठने का सटीक स्थान पता चल गया। अंधी आंखों से भी पृथ्वीराज ने शब्दभेदी बाण चलाकर मोहम्मद गोरी का वध कर दिया। इसके बाद बंदी बनाए जाने से बचने के लिए पृथ्वीराज और चंदबरदाई ने एक-दूसरे को छुरा घोंपकर अपने प्राण त्याग दिए।

2. प्रामाणिक ઐતિહાસિક दृष्टिकोण

मुस्लिम इतिहासकारों (जैसे हसन निज़ामी के ‘ताजुल मासिर’) और सिक्का-शास्त्रीय साक्ष्यों (Numismatic Evidence) के अनुसार, तराइन के युद्ध के बाद गोरी ने पृथ्वीराज को अजमेर का अधीनस्थ शासक (Vassal King) बनाया था। वहां से कुछ ऐसे सिक्के मिले हैं जिनमें एक तरफ ‘पृथ्वीराज’ और दूसरी तरफ ‘मोहम्मद बिन साम’ अंकित है। हालांकि, जब पृथ्वीराज ने पुनः विद्रोह करने का प्रयास किया, तो उन्हें मृत्युदंड दे दिया गया।

8. प्रशासनिक व्यवस्था और सांस्कृतिक योगदान

पृथ्वीराज चौहान केवल एक महान योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वे साहित्य और कला के भी महान संरक्षक थे:

  • साहित्यिक संरक्षण: उनके दरबार में कई उच्च कोटि के विद्वान और कवि निवास करते थे। इनमें जयजनक (पृथ्वीराज विजय के लेखक), चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो के रचयिता), विद्यापति गौड़, जनार्दन, और विश्वरूप शामिल थे।

  • भवन निर्माण: उन्होंने अजमेर और दिल्ली (राय पिथोरा का किला) में कई स्थापत्य संरचनाओं और दुर्गों का निर्माण व सुदृढ़ीकरण करवाया।

  • प्रशासनिक दक्षता: उनका राज्य कई प्रांतों में बंटा हुआ था और स्थानीय प्रशासन सामंतों व मंत्रियों की परिषद द्वारा संचालित होता था।

9. ऐतिहासिक विरासत (Historical Legacy)

महाराजा पृथ्वीराज चौहान को भारतीय इतिहास में स्वाभिमान, अदम्य साहस, वीरता और देशभक्ति के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद भले ही भारत का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया, लेकिन पृथ्वीराज की शूरवीरता की गाथाएं आज भी भारत के जन-मन में जीवित हैं।

वे उस दौर के अंतिम हिंदू सम्राट थे जिन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ संपूर्ण उत्तर भारत की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

10. Frequently Asked Questions (FAQs)

Q1. पृथ्वीराज चौहान कौन थे?

उत्तर: पृथ्वीराज चौहान (पृथ्वीराज तृतीय) चाहमान (चौहान) राजवंश के सबसे प्रसिद्ध हिंदू राजा थे, जिन्होंने 12वीं शताब्दी में अजमेर और दिल्ली से उत्तर भारत पर शासन किया था।

Q2. तराइन का प्रथम युद्ध कब और किसके बीच हुआ था?

उत्तर: तराइन का प्रथम युद्ध 1191 ईस्वी में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गोरी के बीच हुआ था, जिसमें पृथ्वीराज चौहान की शानदार विजय हुई थी।

Q3. तराइन के द्वितीय युद्ध का क्या परिणाम हुआ?

उत्तर: 1192 ईस्वी में हुए तराइन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद गोरी ने छल और कूटनीति से पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया। इस युद्ध के बाद भारत में मुस्लिम शासन (दिल्ली सल्तनत) की नींव पड़ी।

Q4. ‘पृथ्वीराज रासो’ के रचयिता कौन थे?

उत्तर: ‘पृथ्वीराज रासो’ महाकाव्य के रचयिता पृथ्वीराज चौहान के मित्र और दरबारी कवि चंदबरदाई थे।

Q5. शब्दभेदी बाण क्या होता है?

उत्तर: शब्दभेदी बाण धनुर्विद्या की एक प्राचीन और दुर्लभ कला है, जिसमें धनुर्धर बिना देखे केवल आवाज (ध्वनि) के आधार पर लक्ष्य पर सटीक निशाना लगा सकता है।

Q6. पृथ्वीराज चौहान के पिता और माता का क्या नाम था?

उत्तर: उनके पिता का नाम राजा सोमेश्वर चौहान और माता का नाम महारानी कर्पूरी देवी था।

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