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छंद किसे कहते हैं? जानें परिभाषा, अंग, प्रकार और आसान उदाहरण

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हिंदी साहित्य और व्याकरण में छंद (Chhand) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार गद्य को व्याकरण के नियमों से नियंत्रित किया जाता है, ठीक उसी प्रकार काव्य या कविता को लयबद्ध और सुरीला बनाने के लिए छंद का प्रयोग किया जाता है।

यदि आप स्कूल या कॉलेज के छात्र हैं, अथवा प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UPSC, CTET, State PSC, UPTET, SSC) की तैयारी कर रहे हैं, तो छंद के नियमों, अंगों और प्रकारों को समझना आपके लिए अनिवार्य है। इस लेख में हम छंद की परिभाषा, उसके सभी अंग, प्रकार और उदाहरणों को विस्तार से समझेंगे।

छंद क्या है? (छंद की परिभाषा)

छंद की परिभाषा: अक्षरों की संख्या, क्रम, मात्रा, गणना, यति (विराम) और गति (लय) से नियोजित एवं नियमबद्ध पद-रचना को छंद कहते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो, जब किसी काव्य रचना में वर्णों (अक्षरों) या मात्राओं की संख्या को एक निश्चित नियम में बाँध दिया जाता है, जिससे उसमें एक विशेष लय और संगीत उत्पन्न होता है, उसे छंद कहा जाता है।

‘छंद’ शब्द की उत्पत्ति और अर्थ

  • धातु: ‘छंद’ शब्द संस्कृत की ‘छिद्’ या ‘छदि’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है — आच्छादित करना, खुश करना या आह्लादित करना

  • ऐतिहासिक संदर्भ: छंद का सबसे पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

  • छंद शास्त्र के प्रणेता: आचार्य पिंगल को छंद शास्त्र का आदि प्रवर्तक माना जाता है। इसी कारण छंद शास्त्र को ‘पिंगल शास्त्र’ भी कहा जाता है।

काव्य में छंद का महत्व

कविता में छंद का प्रयोग केवल सौंदर्य बढ़ाने के लिए ही नहीं, बल्कि उसके भावों को गहराई देने के लिए भी किया जाता है:

  1. संगीतात्मकता (Lyrical Quality): छंद कविता को गाने योग्य और सुरीला बनाता है।

  2. स्मरण में आसानी: छंदबद्ध पंक्तियां आसानी से याद हो जाती हैं (जैसे हनुमान चालीसा या कबीर के दोहे)।

  3. भावों की तीव्रता: सही छंद का चयन पाठक के हृदय में रस (करुण, वीर, श्रृंगार आदि) का संचार करता है।

छंद के ७ मुख्य अंग (Elements of Chhand)

छंद की संरचना को समझने के लिए इसके ७ मूलभूत अंगों को जानना अत्यंत आवश्यक है:

                  ┌─────────────────────────────────────────┐
                  │           छंद के ७ मुख्य अंग           │
                  └────────────────────┬────────────────────┘
                                       │
      ┌──────────┬──────────┬──────────┼──────────┬──────────┬──────────┐
      │          │          │          │          │          │          │
   १. चरण     २. वर्ण     ३. मात्रा   ४. यति     ५. गति     ६. तुक     ७. गण
   (पाद)     और मात्रा   (लघु/गुरु)  (विराम)    (प्रवाह)   (तुकबंदी)  (अक्षर समूह)

१. चरण या पाद (Charan / Pada)

प्रत्येक छंद में सामान्यतः चार भाग होते हैं। इन चारों भागों में से प्रत्येक भाग को ‘चरण’ या ‘पाद’ कहते हैं।

  • सम चरण: द्वितीय और चतुर्थ चरण को ‘सम चरण’ कहते हैं।

  • विषम चरण: प्रथम और तृतीय चरण को ‘विषम चरण’ कहते हैं।

२. वर्ण (Varna)

एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते हैं। वर्ण दो प्रकार के होते हैं:

  • ह्रस्व वर्ण (लघु): अ, इ, उ, ऋ।

  • दीर्घ वर्ण (गुरु): आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।

३. मात्रा (Matra)

किसी वर्ण या अक्षर के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं। छंदशास्त्र में मात्राएँ दो प्रकार की होती हैं:

  1. लघु मात्रा (।): इसके लिए ‘१’ मात्रा गिनी जाती है। (चिह्न: )

  2. गुरु मात्रा (ऽ): इसके लिए ‘२’ मात्राएं गिनी जाती हैं। (चिह्न: )

मात्रा गिनने के सुनहरे नियम (Rules of Counting Matras):

  • ह्रस्व स्वरों (अ, इ, उ, ऋ) और चंद्रबिंदु (ँ) वाले अक्षरों की १ मात्रा (।) होती है।

  • दीर्घ स्वरों (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ), अनुस्वार (ं) और विसर्ग (ः) वाले अक्षरों की २ मात्राएं (ऽ) होती हैं।

  • संयुक्त अक्षर से ठीक पहले वाले अक्षर को गुरु (२ मात्रा) माना जाता है।

४. यति (Yati)

कविता पढ़ते समय जहाँ थोड़ा रुकना पड़ता है या विराम लिया जाता है, उसे यति कहते हैं। छंद में यति का सही पालन न करने से लय टूट जाती है।

५. गति (Gati)

छंद के प्रवाह या पढ़ने की लय/रफ़्तार को गति कहते हैं।

६. तुक (Tuk)

चरणों के अंत में मिलने वाले समान उच्चारण वाले वर्णों या अक्षरों की समानता को तुक कहते हैं।

  • तुकान्त छंद: जिनमें अंत में तुक मिले।

  • अतुकान्त छंद: जिनमें अंत में तुक न मिले (आधुनिक मुक्त छंद)।

७. गण (Gan)

वर्णिक छंदों की गणना के लिए तीन-तीन वर्णों के समूह को गण कहा जाता है। कुल गणों की संख्या होती है।

गणों को याद रखने का सूत्र:

“यमाताराजभानसलगा”

गण का नामसूत्रवर्ण रूपमात्रा रूप (संरचना)उदाहरण
यगणयमातालघु-गुरु-गुरु। ऽ ऽयशोदा
मगणमाता रागुरु-गुरु-गुरुऽ ऽ ऽतारागण
तगणतारा जगुरु-गुरु-लघुऽ ऽ ।तालाब
रगणराज भागुरु-लघु-गुरुऽ । ऽराधिका
जगणजग नलघु-गुरु-लघु। ऽ ।जहान
भगणभान सगुरु-लघु-लघुऽ । ।भारत
नगणन स ललघु-लघु-लघु। । ।कमल
सगणस ल गालघु-लघु-गुरु। । ऽसमता

छंद के मुख्य प्रकार (Types of Chhand)

मुख्य रूप से छंद को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

  1. मात्रिक छंद (Matrik Chhand)

  2. वर्णिक छंद (Varnik Chhand)

  3. मुक्त छंद (Mukt Chhand)

१. मात्रिक छंद (Matrik Chhand)

जिन छंदों की रचना मात्राओं की गिनती के आधार पर की जाती है, उन्हें मात्रिक छंद कहते हैं। मात्रिक छंद तीन प्रकार के होते हैं:

  • सम मात्रिक छंद: जिसके सभी चरणों में मात्राओं की संख्या समान हो।

  • अर्द्धसम मात्रिक छंद: जिसके पहले-तीसरे और दूसरे-चौथे चरणों में मात्राएँ अलग-अलग परंतु आपस में समान हों।

  • विषम मात्रिक छंद: जिसमें चार से अधिक चरण हों और नियम भिन्न हों।

(A) प्रमुख सम मात्रिक छंद

१. चौपाई छंद (Chaupai Chhand)

  • लक्षण: यह एक सम मात्रिक छंद है। इसमें ४ चरण होते हैं।

  • मात्राएँ: इसके प्रत्येक चरण में १६-१६ मात्राएँ होती हैं। अंत में जगण (।) और तगण (ऽ) का आना वर्जित है।

  • उदाहरण:

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। (१६ मात्राएं)

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ (१६ मात्राएं)

राम दूत अतुलित बल धामा। (१६ मात्राएं)

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥ (१६ मात्राएं)

२. रोला छंद (Rola Chhand)

  • लक्षण: यह सम मात्रिक छंद है। इसमें ४ चरण होते हैं।

  • मात्राएँ: इसके प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती हैं। ११ और १३ मात्राओं पर यति (विराम) होता है।

  • उदाहरण:

जो जग हित पर प्राण निछावर कर पाता।

जिसका तन किसी लोक हित में लग जाता॥

३. गीतिका छंद (Gitika Chhand)

  • लक्षण: इसके प्रत्येक चरण में २६ मात्राएँ होती हैं।

  • यति: १४ और १२ मात्राओं पर विराम होता है। अंत में लघु-गुरु होना आवश्यक है।

४. हरिगीतिका छंद (Harigitika Chhand)

  • लक्षण: यह भक्ति और काव्य में अत्यधिक लोकप्रिय छंद है।

  • मात्राएँ: इसके प्रत्येक चरण में २८ मात्राएँ होती हैं।

  • यति: १६ और १२ मात्राओं पर यति होती है। अंत में लघु-गुरु आता है।

(B) प्रमुख अर्द्धसम मात्रिक छंद

१. दोहा छंद (Doha Chhand)

  • लक्षण: दोहा हिंदी का सबसे लोकप्रिय अर्द्धसम मात्रिक छंद है। इसमें ४ चरण होते हैं।

  • मात्राएँ:

    • प्रथम और तृतीय (विषम) चरण: १३ – १३ मात्राएँ।

    • द्वितीय और चतुर्थ (सम) चरण: ११ – ११ मात्राएँ।

  • तुक: सम चरणों के अंत में गुरु-लघु (ऽ ।) आता है और तुक मिलती है।

  • उदाहरण:

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। (१३ + ११ = २४)

बरनऊ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥ (१३ + ११ = २४)

२. सोरठा छंद (Sortha Chhand)

  • लक्षण: सोरठा दोहा छंद का ठीक उल्टा होता है।

  • मात्राएँ:

    • प्रथम और तृतीय (विषम) चरण: ११ – ११ मात्राएँ।

    • द्वितीय और चतुर्थ (सम) चरण: १३ – १३ मात्राएँ।

  • तुक: विषम चरणों के अंत में तुक मिलती है।

  • उदाहरण:

जो सुमिरत सिधि होइ, गन नायक करिबर बदन।

करहु अनुग्रह सोइ, बुद्धि रासि शुभ गुन सदन॥

३. बरवै छंद (Barvai Chhand)

  • लक्षण: इसमें प्रथम और तृतीय चरण में १२-१२ मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में ७-७ मात्राएँ (कुल १९) होती हैं।

४. उल्लाला छंद (Ullala Chhand)

  • लक्षण: इसके विषम चरणों (१, ३) में १५-१५ मात्राएँ तथा सम चरणों (२, ४) में १३-१३ मात्राएँ होती हैं।

(C) प्रमुख विषम मात्रिक छंद

१. कुंडलिया छंद (Kundaliya Chhand)

  • संरचना: यह दोहा + रोला के मिश्रण से बनता है।

  • विशेषता: इसमें कुल ६ चरण होते हैं। जिस शब्द से इस छंद की शुरुआत होती है, उसी शब्द पर इसका अंत भी होता है।

२. छप्पय छंद (Chhappay Chhand)

  • संरचना: यह रोला + उल्लाला के मिश्रण से बनता है। इसमें भी ६ चरण होते हैं (पहले ४ चरण रोला के और अंतिम २ चरण उल्लाला के)।

२. वर्णिक छंद (Varnik Chhand)

जिन छंदों की रचना वर्णों (अक्षरों) की गिनती और गणों के क्रम के आधार पर की जाती है, उन्हें वर्णिक छंद कहते हैं।

प्रमुख वर्णिक छंद और उनकी पहचान:

छंद का नामकुल वर्ण (प्रति चरण)मुख्य पहचान / गण क्रम
इंद्रवज्रा११ वर्णतगण, तगण, जगण और दो गुरु (त, त, ज, २ गुरु)
उपेंद्रवज्रा११ वर्णजगण, तगण, जगण और दो गुरु (ज, त, ज, २ गुरु)
वसन्ततिलका१४ वर्णतगण, भगण, जगण, जगण और दो गुरु
मालिनी१५ वर्णनगण, नगण, मगण, यगण, यगण (८ और ७ पर यति)
मंदाक्रांता१७ वर्णमगण, भगण, नगण, तगण, तगण और दो गुरु (४, ६, ७ पर यति)
शिखरिणी१७ वर्णयगण, मगण, नगण, सगण, भगण, एक लघु, एक गुरु
सवैया२२ से २६ वर्णविभिन्न प्रकार (मत्तगयंद, दुर्मिल आदि)
कवित्त (मनहरण)३१ से ३३ वर्णअंत में गुरु, वर्णों की गिनती पर आधारित

३. मुक्त छंद (Mukt Chhand)

  • परिभाषा: जिस काव्य रचना में न तो मात्राओं का कोई बंधन होता है और न ही वर्णों का, उसे मुक्त छंद या ‘स्वच्छंद कविता’ कहते हैं।

  • प्रवर्तक: हिंदी साहित्य में मुक्त छंद की शुरुआत का श्रेय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को दिया जाता है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘जूही की कली’ मुक्त छंद का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

  • विशेषता: आधुनिक हिंदी कविता में सबसे ज्यादा मुक्त छंद का ही प्रयोग किया जाता है।

मात्रिक छंदों की तुलना (Quick Reference Sheet)

परीक्षार्थी इस तालिका के माध्यम से मात्रिक छंदों को आसानी से याद रख सकते हैं:

छंद का नामप्रकारविषम चरण (१, ३)सम चरण (२, ४)कुल मात्राएं (प्रति पंक्ति)
चौपाईसम मात्रिक१६१६१६
दोहाअर्द्धसम मात्रिक१३११२४
सोरठाअर्द्धसम मात्रिक१११३२४
रोलासम मात्रिक१११३२४
बरवैअर्द्धसम मात्रिक१२१९
गीतिकासम मात्रिक१४१२२६
हरिगीतिकासम मात्रिक१६१२२८

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Examples)

प्रश्न १: “रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून।” में कौन सा छंद है?

उत्तर: दोहा छंद (प्रथम चरण में १३ मात्राएं और द्वितीय में ११ मात्राएं हैं)।

प्रश्न २: दोहा का उल्टा कौन सा छंद होता है?

उत्तर: सोरठा छंद।

प्रश्न ३: छंद शास्त्र के प्रथम आचार्य कौन माने जाते हैं?

उत्तर: आचार्य पिंगल।

प्रश्न ४: ‘यमाताराजभानसलगा’ सूत्र का प्रयोग किसके लिए किया जाता है?

उत्तर: वर्णिक छंदों में ८ गणों की पहचान के लिए।

FAQ (बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1: छंद किसे कहते हैं?

उत्तर: अक्षरों की संख्या, मात्रा, यति, गति और तुक के नियमों से बंधी हुई काव्यात्मक रचना को छंद कहते हैं।

Q2: छंद के मुख्य रूप से कितने प्रकार होते हैं?

उत्तर: छंद के मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं:

  1. मात्रिक छंद

  2. वर्णिक छंद

  3. मुक्त छंद

Q3: दोहा और सोरठा में क्या अंतर है?

उत्तर: दोहा के प्रथम और तृतीय चरण में १३-૧૩ તથા બીજા અને ચોથા ચરણમાં ૧૧-૧૧ માત્રાઓ હોય છે. આનાથી વિપરીત, સોરઠામાં પ્રથમ અને ત્રીજા ચરણમાં ૧૧-૧૧ તથા બીજા અને ચોથા ચરણમાં ૧૩-૧૩ માત્રાઓ હોય છે. સોરઠા એ દોહાનો બિલકુલ ઉલટો છે.

Q4: गणों की कुल संख्या कितनी होती है?

उत्तर: छंद शास्त्र में गणों की कुल संख्या होती है (यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण)।

Q5: मुक्त छंद के प्रवर्तक कौन हैं?

उत्तर: हिंदी साहित्य में मुक्त छंद की शुरुआत महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने की थी।

निष्कर्ष (Conclusion)

हिंदी व्याकरण और साहित्य अध्ययन में छंद का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। छंद न केवल काव्य को मधुरता प्रदान करते हैं, बल्कि भाषा की संरचना को भी अनुशासित करते हैं। मात्रिक और वर्णिक छंदों के नियमों, मात्रा गणने के तरीकों और गण-सूत्रों का अभ्यास करके आप प्रतियोगी परीक्षाओं में इस विषय से संबंधित पूरे अंक प्राप्त कर सकते हैं।

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